ज़ख्म से जड़ें चद्दर लपेट चला जाऊँगा
खून से लथपथ जिस्म, गीली आँखों को छुपा लूंगा,
किसी से कोई शिकायत ना करूँगा, चला जाऊँगा
कसम जिंदगी की, अब चला जाऊंगा
मेरा ना कभी कोई ज़रूरत था यहाँ,
किसी की आफ़त और ना बनूँगा, चला जाऊंगा
तेरी चौखट पे थोड़ी देर सो लेने दे, ए जिंदगी
वादा रहा, होश लौटते ही चला जाऊंगा |
- भास्कर भट्टाचार्य | १० अगस्त, २०२४
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